आधी उम्र युही निकल चुकी है सोचते-सोचते की "लोग क्या कहेंगे !!". और फिर कुछ किया भी नहीं. जो मन चाहता था और जो हम अच्छे से कर सकते थे उसे तो बस दूसरो की इच्छाओं पर कुर्बान करते रहे की उनको क्या अच्छा लगेगा वही करेंगे... और हम अपनी हस्ती मिटाते और अपनी ज़िन्दगी से समझौता करते चले आये..........
कब तक??? आखिर कब तक मै किसी और की इच्छाओं के आगे अपने सपनों के महल तोड़ता रहूँगा... वक़्त का तकाज़ा तो येही कहता है की
अब अपने सपनों को नई उड़ान देनी है,
असल में जो चाहिए थी वो पहचान देनी है...
अब आगे बढ़ना है ...
जो चाहा था मैंने, वो करना है
मानता हूँ मैं मुश्किल आएगी
कोशिश करेगी और मुझे दबाएगी
पर मै भी कम नहीं
उसमें मुझसे ज्यादा दम नहीं
आकर तो देखे उसे पास आने में डर लगेगा
वो क्या बहाएगी मेरा पसीना
जब मेरा जिस्म उसे खून से तर मिलेगा
रही थी अब तक सांसे
किसी और की गुलाम
बहुत कर दी अपनी सांसे, मैंने
अपनी सुबह और शाम
किसी और के नाम
अब तो बस मै चलूँगा
कोई थमने की कोशिश करले कितनी भी
मै और तेज़ चलूँगा
इक वजह तो दू मैं ज़िन्दगी को
धड़कने के लिए
जिस्म में कुछ सच्चा लहू तो ह़ो
फड़कने के लिए
तो मज़ा आता है
मुस्कुराने में,
अफ़सोस नहीं रहता कहीं
खुशियाँ जताने में..
और मज़ा आता है जीते जाने में
फिर और मज़ा आता है जीते जाने में..
अपनी जिंदगी ज़रा खुल के जियो यारों !!
मन की पतंगों को नया आसमान दो यारों !!
अब काहे का load लेना ??
अब हंस भी दो यारों !!
Sunday, February 21, 2010
Subscribe to:
Posts (Atom)
.jpg)